ग्रामीण हरियाणा में महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए सरकार द्वारा योग पहल

भारत में कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व का ऐतिहासिक विश्लेषण

संस्कृत साहित्य और साहित्यानुवाद का स्वरूप एवं परंपराएं

GBS HINDI VOLUME 1 ISSUE 2

ग्रामीण भारत में ट्रांसजेंडर समुदाय की सामाजिक स्थिति : भेदभाव और स्वीकृति का अध्ययन

गाांधीवादी दर्शन और ग्रामीण विकास पहलें

GBS English Volume 1 Issue 1

भारत के पारंपरिक लोक चित्रों का आधार ग्रामीण जनजीवन

Author: डॉ. सरिता पाण्डेय, सहायक प्राध्यापिक, एकलव्य  विश्वविद्यालय  दमोह, मध्य प्रदेश

सारांश     

लोक चित्रों में चित्र किसी एक व्यक्ति की भावनाओं पर नहीं बल्कि समस्त समाज की भावनाओं से प्रेरित होकर बनाये जाते हैं। लोक कलाकार सदैव अपने समाज परम्परा के वातावरण में रहकर चित्रों का निर्माण करता है जहाँ उसका कोई प्रतिद्वन्दी नहीं होता। प्रत्येक समाज में आवश्यकता अनुसार परम्पराओं में जो बदलाव आते हैं उन्हें भी परम्पराओं के साथ लोक कला में सुधार कर दिये जाते हैं। लोक कला व्यक्ति के विकास का माध्यम है। लोक कला निरन्तर नवीन सृजन एवं विकास कि एक उचित प्रक्रिया है। लोक संस्कृति मनुष्य के जीवन के संस्कार है। जो वह अपने साथ लेकर जीवन के सफर में आगे बढ़ता है। यह संस्कृति गाँवो, शहरों में समान रूप से विद्यमान है। यह व्यक्ति के आध्यात्मिक विकास का आधार है। लोक कला के द्वारा व्यक्ति अपने संस्कारों, प्रेम, करुणा के भावों, क्षमा, अहिंसा के विचारों को अपने व्यक्तित्व में लाने का प्रयास करता है।

लोक कला मानव के जीवन में ईश्वर पर विश्वास करने की प्रेरणा देती है। लोक कला मंगल भावों से ओत-प्रोत यह कलाकार की तुलिका में भरे रंगों से चित्रों को ऐसे स्वरूप को प्रदान करती है, मानों स्वयं ईश्वर का आर्शीवाद हो। इसे देखने वाले दर्शकों को ये कला ह्दय की गहराई तक छू जाती है। जीवन में सर्वश्रेष्ठ को प्राप्त करने और उसका उपयोग करने की प्रवृत्ति केवल मानव के स्वभाव में है। हम सभी ऐसी परिस्थियों में उत्पन्न नहीं होते जहाँ आरम्भ से अंत तक केवल सुख ही मिले इसलिये हमें दुख में अभाव में विपरित परिस्थिति में कैसे एक सर्वश्रेष्ठ मानव बनना है, ये हम लोक कलाकारों से सीख सकते हैं। इस प्रकार लोक कला मानसिक विकास, सामाजिक विकास, आध्यात्मिक विकास के लिये हमेशा से प्रेरणा की श्रोत बनी।

मुख्य शब्दावली: ग्रामीण जनजीवन, परम्परा, संस्कृति, लोककला, अध्यात्म।

ग्रामीण परिवेश में युवा विकास और सामाजिक कौशल पर खेलों का प्रभाव

Author: डॉ.कपिल कुमार साहू, सह प्राध्यापक,  एकलव्य विश्वविद्यालय दमोह, मध्य प्रदेश

सारांश

ग्रामीण परिवेश में युवाओं के विकास हेतु खेल एक अच्छा माध्यम बन सकता है, जिसे शारीरिक शिक्षा के रूप में युवाओं तक पहुंचाने का कार्य वर्तमान में प्रत्येक शिक्षण संस्थान में किया जा रहा है, जिससे   युवाओं का विकास एवं उनको सामाजिक कौशल की शिक्षा प्रदान की जा सके। यह आपको सोचने पर मजबूर करता है कि खेल कैसे दोस्त बनाने में मदद करते हैं। खेल जीतने के बारे में नहीं है खेल एक युवा व्यक्ति के जीवन को बड़े महत्वपूर्ण तरीकों से बदल सकते हैं। खेल बच्चों और किसानों को मनोरंजन प्रतियोगिता और एक टीम के रूप में काम करने के माध्यम से महत्वपूर्ण कौशल सीखाते हैं, लेकिन खेलों के कई अच्छे पहलू भी है जैसे बेहतर स्वास्थ्य और दोस्त बनाना जो बच्चे खेल खेलते हैं, उनकी वयस्क होने पर शारीरिक रूप से सक्रिय रहने की संभावना अधिक होती है युवा खेल बेहतर अकादमी प्रदर्शन और उच्च परीक्षा स्कूल में योगदान दे सकते हैं।

शारीरिक गतिविधि मस्तिष्क और शरीर के लिए अच्छी होती है या बच्चों को स्कूल में अच्छा प्रदर्शन करने और समस्याओं को हल करने में मदद करती है सक्रिय रहने से आत्मविश्वास और कौशल बढ़ता है जिससे सक्रिय बने रहना आसान हो जाता है सामाजिक और भावनात्मक कौशल सिखाना बहुत जरूरी है यह स्कूल के कार्यों को पूर्ण करने में मदद करता है। युवा खेलों के बड़े मनोवैज्ञानिक लाभ है वे बच्चों और किशोर के मानसिक स्वास्थ्य और कल्याण में बहुत मदद करते हैं।

मुख्य शब्दावली- ग्रामीण परिवेश, शारीरिक शिक्षा, खेल, सामाजिक कौशल।

अंतर्राष्ट्रीय संबंधो के प्रतिमानों में नेताजी सुभाष चंद्र बोस और नरेंद्र मोदी का विश्लेषणात्मक अध्ययन

Author: डॉ निकिता राज, अतिथि शिक्षिका, राज नारायण महाविद्यालय, हाजीपुर

शोध-सार

यह लेख नेताजी सुभाष चंद्र बोस और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीतियों के तुलनात्मक अध्ययन पर आधारित है। इसमें सुभाष चंद्र बोस के अंतरराष्ट्रीय संबंधों और नरेंद्र मोदी की मौजूदा विदेश नीति में समानताएं खोजी गई हैं। शोध-पत्र में दोनों नेताओं की नीतियों और विचारधाराओं की तुलनात्मक समीक्षा करते हुए इस बात पर ध्यान दिया गया है कि दोनों ने किस प्रकार अपने देश की अखंडता और संप्रभुता को बनाए रखा। इसके अलावा, साहित्य समीक्षा और तुलनात्मक दृष्टिकोण द्वारा उनके अंतर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण का विश्लेषणात्मक अध्ययन किया गया है।

शब्द-कुंजी- सुभाष चंद्र बोस, नरेंद्र मोदी, विदेश नीति, अंतरराष्ट्रीय संबंध, तुलनात्मक अध्ययन, अखंडता, संप्रभुता।