गांधीवादी दर्शन और ग्रामीण विकास पहल

Author: प्रोफेसर अरबिंदो महतो, इग्नू, नई दिल्ली

सारांश

महात्मा गांधी के ग्रामीण विकास के दार्शनिक ढांचे में आत्मनिर्भरता, स्थिरता और समुदाय-आधारित प्रगति को प्राथमिकता दी गई है। उनका मानना था कि भारतीय स्वतंत्रता की प्राप्ति गांवों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर और व्यवहार्य इकाइयों में बदलने पर निर्भर करती है। स्वदेशी, ग्राम स्वराज, सर्वोदय, सादा जीवन और नई तालीम जैसे उनके मुख्य सिद्धांत एक अधिक समावेशी, करुणामय और एकीकृत सामाजिक संरचना की स्थापना पर केंद्रित हैं।

ग्रामीण विकास को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न पहलें लागू की गई हैं, जिनमें 1956 में स्थापित खादी और ग्रामोद्योग आयोग (केवीआईसी), विनोबा भावे के नेतृत्व में भूदान आंदोलन, 1952 में शुरू किया गया सामुदायिक विकास कार्यक्रम, ग्रामीण सहकारी समितियों को बढ़ावा देना, जैविक कृषि पद्धतियाँ, स्वयं सहायता समूह, महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) जैसी ग्रामीण रोजगार योजनाएं और एक जिला एक उत्पाद (ओडीओपी) पहल शामिल हैं।

शहरी प्रवास, बाहरी सहायता पर अत्यधिक निर्भरता और पर्यावरणीय क्षरण जैसी चुनौतियों के बावजूद, आत्मनिर्भरता, समान संसाधन वितरण और जमीनी स्तर पर सशक्तिकरण के संबंध में गांधीवादी दृष्टिकोण ग्रामीण विकास के लिए एक टिकाऊ और समावेशी ढांचा प्रदान कर सकता है। इन आदर्शों के पुनरुद्धार और आधुनिकीकरण में ग्रामीण क्षेत्रों में सतत विकास, समानता और समग्र कल्याण को बढ़ावा देने की क्षमता है, जिससे ग्रामीण भारत के लिए एक समृद्ध भविष्य का मार्ग प्रशस्त होगा।

Posted in Hindi Research Papers, Volume 1 Feb 2025.

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