भारत के पारंपरिक लोक चित्रों का आधार ग्रामीण जनजीवन

Author: डॉ. सरिता पाण्डेय, सहायक प्राध्यापिक, एकलव्य  विश्वविद्यालय  दमोह, मध्य प्रदेश

सारांश     

लोक चित्रों में चित्र किसी एक व्यक्ति की भावनाओं पर नहीं बल्कि समस्त समाज की भावनाओं से प्रेरित होकर बनाये जाते हैं। लोक कलाकार सदैव अपने समाज परम्परा के वातावरण में रहकर चित्रों का निर्माण करता है जहाँ उसका कोई प्रतिद्वन्दी नहीं होता। प्रत्येक समाज में आवश्यकता अनुसार परम्पराओं में जो बदलाव आते हैं उन्हें भी परम्पराओं के साथ लोक कला में सुधार कर दिये जाते हैं। लोक कला व्यक्ति के विकास का माध्यम है। लोक कला निरन्तर नवीन सृजन एवं विकास कि एक उचित प्रक्रिया है। लोक संस्कृति मनुष्य के जीवन के संस्कार है। जो वह अपने साथ लेकर जीवन के सफर में आगे बढ़ता है। यह संस्कृति गाँवो, शहरों में समान रूप से विद्यमान है। यह व्यक्ति के आध्यात्मिक विकास का आधार है। लोक कला के द्वारा व्यक्ति अपने संस्कारों, प्रेम, करुणा के भावों, क्षमा, अहिंसा के विचारों को अपने व्यक्तित्व में लाने का प्रयास करता है।

लोक कला मानव के जीवन में ईश्वर पर विश्वास करने की प्रेरणा देती है। लोक कला मंगल भावों से ओत-प्रोत यह कलाकार की तुलिका में भरे रंगों से चित्रों को ऐसे स्वरूप को प्रदान करती है, मानों स्वयं ईश्वर का आर्शीवाद हो। इसे देखने वाले दर्शकों को ये कला ह्दय की गहराई तक छू जाती है। जीवन में सर्वश्रेष्ठ को प्राप्त करने और उसका उपयोग करने की प्रवृत्ति केवल मानव के स्वभाव में है। हम सभी ऐसी परिस्थियों में उत्पन्न नहीं होते जहाँ आरम्भ से अंत तक केवल सुख ही मिले इसलिये हमें दुख में अभाव में विपरित परिस्थिति में कैसे एक सर्वश्रेष्ठ मानव बनना है, ये हम लोक कलाकारों से सीख सकते हैं। इस प्रकार लोक कला मानसिक विकास, सामाजिक विकास, आध्यात्मिक विकास के लिये हमेशा से प्रेरणा की श्रोत बनी।

मुख्य शब्दावली: ग्रामीण जनजीवन, परम्परा, संस्कृति, लोककला, अध्यात्म।

Posted in Hindi Research Papers, Volume 1 Feb 2025.

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