संस्कृत साहित्य और साहित्यानुवाद का स्वरूप एवं परंपराएं

Author: डॉ. गोविन्द कुमार धारीवाल, सहायक अध्यापक, रा. इ. का. धोपडधार, टिहरी गढ़वाल, उत्तराखंड

सार

वर्तमान समय को अनुवाद का युग माना जाता है, क्योंकि साहित्यिक अनुवाद के माध्यम से विश्व एक संकुचित इकाई बन गया है। यद्यपि, वर्तमान अनुवाद प्रक्रिया तथा प्राचीन काल की अनुवाद प्रक्रिया में एक महत्त्वपूर्ण अंतर निहित है, क्योंकि प्राचीन भारतीय साहित्य अथवा किसी अन्य विधा में अनुवादित साहित्य का अभाव है। समकालीन विद्वानों एवं ऋषियों ने अपनी विद्वत्ता एवं ज्ञान के माध्यम से ज्ञान का प्रसार किया। प्राचीन भारतीय साहित्य का आधार वैदिक साहित्य है, जो संस्कृत साहित्य के ज्ञानवर्धक ग्रंथों से परिपूर्ण है। वैदिक साहित्य आज विश्व में ज्ञान का प्रकाशस्तंभ बन गया है, किन्तु वर्तमान में, संपूर्ण वैदिक साहित्य विभिन्न भाषाओं में अनूदित किया गया है।

प्राचीन भारतीय साहित्य में संस्कृत, पाली, प्राकृत इत्यादि भाषाओं से अत्यधिक अनुवाद किया गया, परन्तु इन भाषाओं में विदेशी भाषाओं का कोई अनुवाद उपलब्ध नहीं है। इसकी लोकप्रियता का मुख्य कारण 'अभिज्ञानशाकुंतलम' का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद था, क्योंकि कालिदास के 'अभिज्ञानशाकुंतलम' नाटक तथा 'मेघदूत' एवं 'ऋतुसंहार' जैसे काव्यों से विश्व अपरिचित था। वर्तमान में, संस्कृत साहित्य के सभी ग्रंथों का अन्य भारतीय एवं विदेशी भाषाओं में अनुवाद किया जा चुका है। अनेक विद्वानों ने इन ग्रंथों का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद करके भारतीय ज्ञान भंडार को विश्व के समक्ष प्रस्तुत किया है। इसकी ख्याति का एक प्रमुख कारण 'अभिज्ञान शाकुंतलम' का इन भाषाओं में अनुवाद भी है।

Posted in Hindi Research Papers, Volume 1 Feb 2025.

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